श्रीमद्भगवद्गीता की गणना प्रस्थानत्रयी के अन्तर्गत की जाती है। प्रस्थानत्रयी वेदान्त के तीन आधार स्तम्भ माने जाते हैं।
ये तीन दिव्य शास्त्र परब्रह्म विषयक शास्त्र हैं। ये तीनों वैदिक सानातन धर्म में अध्यात्म ज्ञान के श्रेष्ठ ग्रन्थ माने जाते हैं। इस प्रस्थानत्रयी में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र का भी भाष्य स्वरूप है अर्थात् श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषदों और वेदान्त सूत्र का अर्थ करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः एक स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं है। यह भगवान् वेद व्यास कृत श्रीमहाभारत ग्रन्थ का एक अंश मात्र है। यह 700 श्लोकों से युक्त 18 अध्यायों वाला एक दिव्य साहित्य है।
भारतामृतसर्वस्वं विष्णोक्त्राद्विनिः सृतम् ।
गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।
(गीता माहात्म्य — श्लोक 5)
भारतामृतसर्वस्वं — यह श्रीमद्भगवद्गीता श्रीमहाभारत शास्त्र का सार सर्वस्व है और श्रीमहाभारत शास्त्र मूल चार वेदों (ऋग, यजु, साम व अथर्ववेद) का भावार्थ माना जाता है, इसलिए यह श्रीमद्भगवद्गीता मूल चार वेदों का ही सार सर्वस्व है। विष्णोक्त्राद्विनिः सृतम् — और यह मूल विष्णु भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निस्सृत है। गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते — जो श्रीमद्भगवद्गीता रूपी गंगाजल का पान कर लेता है, उसका इस संसार में पुनर्जन्म नहीं होता।
कोई सोच सकता है कि श्रीमद्भगवद्गीता का तात्पर्य कर्मयोग, ज्ञानयोग अथवा ध्यानयोग है, किन्तु गीता से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीमद्भगवद्गीता का तात्पर्य भक्तियोग है।
श्रीमद्भगवद्गीता के 700 श्लोक रूपी मोतियों में से 108 सिद्धांतत्रयात्मक अतिसुन्दर श्लोकों का चयन करके वैष्णवों के लिए एक दिव्यमाला का निर्माण किया गया है इसी का नाम गीता माला है जिसे समझ लेने पर गीता का वास्तविक उद्देश्य समझ आ जायेगा।
गीता माला की व्याख्या समझने से पहले गीता ज्ञान धारा प्रवचन श्रृंखला के माध्यम से गीता के प्रतिपाद्य विषयों की जानकारी होना आवश्यक हैं।
गीता ज्ञानधारा श्रवण करने हेतु एवं गीता माला के श्लोकों का तात्पर्य समझने हेतु नीचे दिए गए यूट्यूब क्लिप्स पर क्लिक कीजिए।