भूतल पर विद्यमान समस्त वैदिक शास्त्रों में श्रीमद्भागवत पुराण का स्थान सर्वोच्च है। यह वैष्णावों का सर्वाधिक प्रिय शास्त्र है। कलिकाल में अज्ञानान्धकार को दूर करने में श्रीमद्भागवत दिव्यज्ञान रूपी सूर्य के समान है।
कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह ।
कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः ।।
(श्री भा. 1-3-43)
भगवान श्रीकृष्ण के धर्म, ज्ञानादि सहित अपने परम धाम चले जाने के पश्चात् कलियुग में अज्ञानान्धकार से अंधे लोगों के लिए यह श्रीमद्भागवतपुराण रूपी सूर्य इस समय उदित हुआ है।
पद्मपुराण में बताया गया है कि भागवत साक्षात श्रीकृष्ण का स्वरूप है ।
पादौ यदियौ प्रथमद्वितीयौ तृतीयतुर्यौ कथितौ यदूरू ।
नाभिस्तथा पञ्चम एव षष्ठौ भुजान्तरं दोर्युगलं तथान्यौ ।।
(1)
कण्ठस्तु राजन्नवमो यदियो मुखारविन्दं दशमः प्रफुल्लम् ।
एकादशो यस्य ललाटपट्टं शिरोऽपि तु द्वादश एव भाति ।।
(2)
तमादिदेवं करुणानिधानं तमालवर्णं सुहितावतारम् ।
अपारसंसार-समुद्र-सेतुं भजामहे भागवत स्वरूपम् ।।
(3)
पद्म पुराण कहता है-
"मैं ऐसे श्रीमद्भागवत का भजन करता हूँ जो करुणानिधान, आदिदेव श्यामवर्ण श्रीकृष्ण का ही मंगलमय शब्दावतार है; श्रीमद्भागवत इस अपार संसार सागर पार करने के लिए एक सेतु स्वरूप है । इस श्रीमद्भागवत के 12 स्कन्ध हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य द्वादश अंगों के समान ही हैं ।
भागवत का पहला और दूसरा स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण के युगल चरण समान, तीसरा और चौथा स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण की जंघाएँ, पाँचवाँ स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण की नाभि, छठा स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण का वक्षस्थल, सातवाँ और आठवाँ स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण की दो भुजाएँ, नौवां स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण का कण्ठ, दशम स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण का प्रफुल्लित मुखमण्डल, ग्यारहवा स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण का मस्तक और बारहवां स्कन्ध भगवान् श्रीकृष्ण का सिर है ।"
प्रस्थानत्रयी नाम से विख्यात श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र या वेदान्तसूत्र और उपनिषद् या वेदान्त एकत्रित रूप से श्रीमद्भागवत में ही विद्यमान हैं। श्रीमद्भागवत भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष शब्दमयी मूर्ति है और भगवान श्रीकृष्ण के समान ही पूजनीय है। यह बारह स्कन्धों, तीन सौ पैंतीस अध्यायों और अठारह हजार श्लोकों से युक्त एक दिव्य साहित्य है, जो आद्योपान्त सर्वत्र ही परमेश्वर श्रीकृष्ण और उनकी भक्ति की महिमा से ओतप्रोत है।
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