एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am
एकादशी- 27 मई 2026 पारण समय 5:26 am to 7:56 am तथा 11 जून 2026 पारण समय 5:25 am to 9:48 am

श्रीमद्भगवद्गीता - पञ्चदश अध्याय (पुरुषोत्तम-योग)

श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१॥

श्रीभगवान् ने कहा— इस संसार को एक अविनाशी अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष के समान बताया गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर (ब्रह्मलोक में) और शाखाएँ नीचे की ओर हैं। वेद के छन्द इसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को मूल सहित जानता है, वही वेदों का ज्ञाता है।

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥२॥

इस वृक्ष की शाखाएँ तीनों गुणों (सत्, रज, तम) द्वारा पोषित होकर ऊपर और नीचे सर्वत्र फैली हुई हैं। इन्द्रिय-विषय इसकी कोपलें हैं। इस मनुष्य लोक में कर्म के अनुसार बाँधने वाली जड़ें भी नीचे की ओर फैली हुई हैं।

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥३॥

इस संसार-वृक्ष का वास्तविक स्वरूप इस लोक में वैसा नहीं दिखता जैसा बताया गया है; न इसका आदि है, न अन्त है और न ही इसका कोई आधार है। इसलिए, अत्यन्त दृढ़ मूलों वाले इस अश्वत्थ वृक्ष को वैराग्य रूपी सुदृढ़ शस्त्र द्वारा काटकर...

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥४॥

...उस परम पद (परमेश्वर) की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचे हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते। मैं उसी आदि पुरुष नारायण की शरण लेता हूँ, जिससे इस पुरातन संसार-वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है।

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्यय तत् ॥५॥

जो मान और मोह से रहित हैं, जिन्होंने आसक्ति रूपी दोष को जीत लिया है, जो परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थित हैं और जिनकी कामनाएँ पूर्णतः निवृत्त हो चुकी हैं—वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से मुक्त होकर उस अविनाशी परम पद को प्राप्त करते हैं।

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥६॥

उस परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न ही अग्नि। जहाँ पहुँचकर मनुष्य फिर लौटकर नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥७॥

इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है। वही प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को अपनी ओर खींचता है।

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥८॥

जैसे वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को लेकर चलती है, वैसे ही देह का स्वामी जीवात्मा एक शरीर को छोड़कर जब दूसरे शरीर में जाता है, तब वह इन मन सहित इन्द्रियों को साथ लेकर जाता है।

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥९॥

कान, आँख, त्वचा, रसना और नासिका—इन इन्द्रियों और मन के आश्रय से ही यह जीवात्मा विषयों का भोग करता है।

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥१०॥

शरीर को छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए अथवा गुणों से युक्त होकर विषयों का भोग करते हुए जीवात्मा को अज्ञानी नहीं देख पाते; केवल ज्ञान रूपी नेत्रों वाले विवेकशील ही उसे देख पाते हैं।

यतो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥११॥

योगीजन यत्न करते हुए अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख पाते हैं। किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, वे अज्ञानी यत्न करने पर भी इसे नहीं देख पाते।

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१२॥

सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है, उस तेज को तुम मेरा ही जानो।

गामाविश्य च भूतानि धारयामि अहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥१३॥

मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसमय चन्द्रमा बनकर सम्पूर्ण वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥१४॥

मैं ही सब प्राणियों के शरीर में 'वैश्वानर' अग्नि बनकर प्राण और अपान वायु के साथ मिलकर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ।

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥१५॥

मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है। समस्त वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ; वेदान्त का रचयिता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥१६॥

इस संसार में दो प्रकार के पुरुष (तत्व) हैं—क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी)। सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर 'क्षर' हैं और कूटस्थ जीवात्मा 'अक्षर' कहा जाता है।

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१७॥

किन्तु इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जिसे 'परमात्मा' कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण-पोषण करता है।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥१८॥

चूँकि मैं क्षर से सर्वथा अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक और वेद में मैं 'पुरुषोत्तम' के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥१९॥

हे भरतवंशी अर्जुन! जो मोह रहित पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष मुझे ही सब प्रकार से भजता है।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥२०॥

हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्यमय शास्त्र (ज्ञान) मैंने तुम्हें बताया है। इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतार्थ हो जाता है।

इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥